मेहरबान

Tuesday, April 28, 2020

खुमार

ऐसा नशा छाया है खुमारी का...की बस यही चाह है, वक़्त यहीं थम जाए! ....हाँ पता है वक़्त कभी रुकता नही... किसी के लिए.... कम से कम सामने रुकी हुई घड़ी ही रख दो!

Wednesday, January 1, 2020

उनीस-बीस का फर्क

क्या ये नया साल?
क्या ये नया दिन?
 और ...क्या ये नई सदी?
....
जहां देखो वहां लोगों ने यादों का तांता लगा रखा है..
काफी लोग वर्तमान को भूल भविष्य के दशक को संजोंने की बात करते हैं...
 
मेरे लिए तो वो ही बुधवार...वो है सुबह...वो है शाम...
बस...उन्नीस-बीस का फर्क है...

Monday, April 29, 2019

एक ही हूँ!

खुशनसीब हूं मैं...जो लगभग सभी रिश्तों से जुड़ा हूँ!
माँ, बहन, प्रेमिका (जो अब बीवी भी है), बेटी और मेरी सास...
मेरे लिए वो पांच हैं...मगर उनके लिए तो मैं 'एक' ही हूँ...
सोचता हूँ कभी कभी की... क्या में निभा पाता हूँ?

जान

आदमी भी एक सांप की तरह है...
हर दफा 'जान' एक केचुली की तरह बदलता है!
...पहले माँ, फिर माशूका...अब बेटी है उसकी जान.

हैदराबाद!

...नए चहरे...ये नया शहर,
वैसे तो नया नही है....,
कहते है निजाम रहा करते थे!
....मगर ये ...नवाब क्या कर रहा है यहां!

-सपन

Tuesday, December 1, 2015

दो अक्टूबर दो हज़ार पन्दरह

रोकने की कोशिश तो बहुत की .. पर जल्दी थी आपको .. जो चले गए... . अपनों को अपनों से अलग करने की... यही तो रीत है कबसे ... भुलाये न भूलेगी वो दो अक्टूबर दो हज़ार पन्दरह की रात, अबसे...

कन्धा

जिन कन्धों पर देखा सारा जहाँ .. ...ता उम्र लिया था अपने कन्धों पर जो मेरा बोझ... जिसने कंधे तक लाकर चलना भी सिखाया.. आज वो ओझल हो गया अचानक...दीखता कही नहीं है... ..उस कंधे का सहारा चाहिए.. जिसको अभी मैं कन्धा देकर आ रहा हु!