मेहरबान

Tuesday, December 1, 2015

दो अक्टूबर दो हज़ार पन्दरह

रोकने की कोशिश तो बहुत की .. पर जल्दी थी आपको .. जो चले गए... . अपनों को अपनों से अलग करने की... यही तो रीत है कबसे ... भुलाये न भूलेगी वो दो अक्टूबर दो हज़ार पन्दरह की रात, अबसे...

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