ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के......ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी
के.....कहाँ है कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के....?....जिन्हें नाज़ है हिंद
पर,वो कहाँ हैं....???? - साहिर लुधियानवी
मेरा उत्तर:
वो यहीं है यहीं कहीं है जिन्हें नाज़ है हिंद पर,
बस उकसाने की देर है, और इस समय का फेर है,
जनका लुटा कारवां.. जो हो गये बेघर,
हैं शांत जो...न समझ उन्हें कायर,
बरस जो पड़े तो कोई बाँध न रोक पायेगा,
तुम ही हो - हम ही हैं..... वो जिन्हें नाज़ है हिंद पर,
यही कहीं छुपा बैठा है वो हम सब में, बस निकलने की देर है,
वो यहीं हैं यहीं कहीं हैं..... जिन्हें नाज़ है हिंद पर!!
-सपन
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